जब जागे तब सवेरा
सोचा जब मन में तो जाना, क्या मैं ले कर आया
ऐसा क्या कुछ किया था मैंने, जो इतना कुछ पाया
इधर उधर की ऊँच नीच में, जीवन व्यर्थ गवांया
साँझ काल होने को आई, तब कुछ समझ में आया
मार्ग नहीं है सुगम यह जाना, प्रथम कदम जो बढ़ाया
सद्गुरु आकर हाथ को थामा, उचित मार्ग दिखलाया
