Saturday, January 11, 2025

मेरी व्यथा

लगता है गुजरते वक्त के साथ
मेरा दिमागी संतुलन भी धीरे-धीरे जा रहा है

यूं ही बैठे-बैठे आंखों का नम हो जाना, 
बहुत सोचना, हमेशा उलझन में रहना
कहने को तो एक से बढ़ कर एक हर रिश्ता है मेरा
लेकिन फिर भी खुद को अकेला पाता हूं
भीड़ में होते हुए भी अकेलापन महसूस करता हूं

ऐसा लगता है मानों सब कुछ छिन गया है, खो गया है
किसी भी चीज में मन नहीं लगता, 
मोबाइल को थामे सोचता रहता हूं कि अब क्या करना है

बस दिल करता है कहीं दूर चला जाऊं 
एक ऐसी जगह जहां मेरे सिवा कोई ना हो,
जहां मैं खुली सांस ले सकूं, खुलकर रो सकूं चीख सकूं!


(Munazir Alam की रचना My Story से अनूदित)

No comments:

Post a Comment